पी एम की कुर्सी की जोड़-तोड़ (अविनाश वाचस्पति)
>> शुक्रवार, २० मार्च २००९
हरिभूमि में आज दिनांक 20 मार्च 2009
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पी एम पद की जोड़ तोड़ में अपने ही संगीन साथियों से होड़ लगाकर मतिविहीन गतिशीला नेताओं को दूध से नहलाया जाना चाहिए। वे दूध के धुले तो कदापि नहीं हो सकते पर उन्हें दूध से नहलाया जा सकता है। दूध मदर डेयरी का है भैंस का है या गाय, बकरी का उंटनी का या शेरनी का, या दूधिए का लाया हुआ दूध है जिसमें पानी भरपूर है या सिंथेटिक है। दूध का तो केवल नाम है स्वाद भी पानी का। पर पानी, पानी पानी नहीं कर पा रहा है, न दूध का असर दिखला रहा है। धुला दूध से जाता है। नहाया शराब से जाता है। गांधी जी के सिद्धांत नहीं नहाए तो उनकी वस्तुओं को उसी ने खरीद लिया जिसका रग रग पग पग शराब में पगा है। सारा धन वहीं से ठगा है। अब सिद्धांतों को ठगा जा रहा है। गांधीगिरी की किसी को कोई फिक्र नहीं ?
जो पी एम की कुर्सी पा गया वो तो समझो दूध से धुल गया और जो रह गए, उनके चेहरे के उड़े रंग धुल जाने की कहानी ब्यान कर रहे होंगे। जो नहीं धुल पाए, वे अब नहायेंगे और नहाना को भी इसी प्रकार परिमार्जित करेंगे। सपने बड़े बड़े देखते हैं तो दूध से भी नहाएं, पर दूध से नहाने की कहां फुरसत है, नहाएंगे तो शराब से, नोटों से तो नहाएंगे भी और नहलाएंगे भी। सपने सभी पी एम बनने के देखते हैं तो एम पी तक तो पहुंच ही जाते हैं। कई तो डायरेक्टे पी एम ही बनना चाहते हैं। हालात इस कदर सुरामय हो चुके हैं कि खटास पैदा हो रही है। खटास जड़ों में मट्ठा भर देगी। यह बात दीगर है कि मलाई पाता है। पर पी एम तो नहीं बन पाता। बाकी सभी मलाईयों का स्वाद ले चुके हैं। एक हसरत ही बाकी है पी एम की रबड़ी का स्वाद ले लिया जाए। पर माया ने ऐसा झटका पैदा कर रखा है कि बिना करंट ही झटके दे रही है। पी एम बनने के लिए इतने सारे उम्मीदवार इस बार ही मंडराने थे, सभी कर्कटा चिल्ला हटें ख्वावबों में भी सुनाई दे रही हैं। हालात इस कदर बेकाबू हैं कि सभी कबूतर कौए बन गए हैं और बोली सबकी कोयल की। तीसरा मोर्चा यानी उसके सपने मजबूत डाल बनने की ओर अग्रसर हैं। पर पता नहीं वो डाली भी काली हो या फिर खाली सिद्ध हो यानी खोखली।

