फागुनियाएं : मस्ती की झलकी
>> गुरुवार, १२ मार्च २००९
मन को जचा फिर खुशी
हथेलियों के रस्ते तुरंत
शोर मचा फांदती हुई
तुरंत बाहर आई
ताली कहलाई।
होली अलमस्ती का पर्व
मस्ती रह गई जब सिर्फ
अल बन गया गौण
कोई भी मस्त , नहीं
रह सकता है मौन।
मस्ती मन में सजती है
आंखों के रस्ते बाहर
आप ही निकलती है
प्राणों में बसती है जिसके
किस्मत बदलती है उसकी।
मस्ती बसती रंग में है
मस्ती मन की सुरंग में है
जब जब बाहर छलकती है
परहेज कोई न करती है
सबके मन पर फबती है।
मस्ती का आलम इतना है
अखबारों पर कहर बरपा है
खबरें रुकती नहीं हैं कभी
अखबारों की छुट्टी करवा
मस्त माहौल बना गई।

