कुत्ते को मारने पर किया गिरफ्तार : न्याय की बढ़ चली रफ्तार
>> सोमवार, २ फरवरी २००९
अखबार के पन्ने पलटते हुये 'नशे में कुत्ते की आंख फोड़ी पुलिस ने हवालात में डाला', दो लाईनों की हैडिंग के साथ तीन कालम की इस खबर ने अनायास ही मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया क्योंकि इसमें घायल कुत्ते का चित्र तथा आरोपी इंसान के दो चित्र भी प्रकाशित थे। आज सुबह जल्दी उठ गया था और अखबार वाला भी रविवार को अमूमन अखबार देर से देता है, मैं भी देर से उठता हूं, इसके विपरीत 5 बजे अखबार मौजूद था।
टी वी पर एक चैनल में एक कुत्ते का सनसनीखेज बयान प्रसारित हो रहा था, वो भौंक भौंक कर कह रहा था कि इतना मारा कि उसकी आंख फोड़ दी। हड्डियां तोड़ दी। वो नशे में था। मार खाने वाला नहीं, मारने वाला बेहद नशे में था। इस घटना को जिसने अंजाम दिया वो जेल में है। अब उसका नशा उतर चुका है। पर इस घटना के बाद आवाराओं की बन आई है, वे यहां वहां गुर्राते, भौंकियाते कूकियाते टांगियाते घूम रहे हैं। अब उन्हें कोई डंडा लगाकर देखे, लगाने की तो दूर, उठाकर भी देखे अथवा उठाने की सोचे तो उसका भी वही हाल होगा जो उस नशेड़ी अनिल का हुआ। न तो वो रन ही ले पाया और न जीत ही सका अपने पिता रंजीत का नाम निरर्थक कर दिया पुत्र अनिल ने। उसका तो नाम ही निरर्थक हो गया। बीच बीच में वीडियो फुटेज से रपट में रंगीनी छा गई थी।
घायल कुत्ते पर हमले के विरुद्ध आवारा कुत्तों ने एक गोष्ठी की और उसमें इस दुर्घटना पर खूब जोर से भौंक भौंक कर दुख प्रकट किया। आखिर हम कुत्ते हैं न, भौंक कर ही तो दुख जतला सकते हैं। सब एक जगह पर इकट्ठे हुए जबकि सबके सब आवारा थे। उन्हें साथ रहना बिल्कुल गवारा नहीं था जैसे इंसान आपस में एक दूसरे को देखकर जलता है, ऐसा ही अरमान कुत्तों के दिल में भी पलता है। पर वे अपने मोहल्ले में एका बनाए रखते हैं और हर नुक्कड़ पर दूसरे मोहल्ले वालों को खदेड़ने के लिए तत्पर रहते हैं। इंसान की ही तरह एक कुतिया के दीवाने होकर आपस में लड़ झपट्टा करते हैं। पर जब भी कोई चाहे अकेला ही घुसने की कोशिश करे या समूह में, वे तुरंत भौंक भौंक कर उस आसमान को भी सिर पर उठा लेते हैं जो पहले ही उठा हुआ होता है। बिजली जाने पर जनरेटर के शोर से, ट्रैफिक होने पर गाडि़यों के हॉर्न की आवाज से, ऑफिस होने पर कर्मचारियों की चिल्ल पौं से, जनसभाओं में नेताओं के भाषण के एकालाप से, घर होने पर सास बहू के कलरव से, स्कूल होने पर बच्चों की धमा चौकड़ी से, अस्पताल होने पर मरीजों की चीख पुकार से, मतलब उठे हुए आसमान को और उठाने में अपना योगदान अवश्य देते हैं।
नाम सिर्फ एक सार्थक हुआ और खूब हुआ। मेनका के संज्ञान में दुर्घटना आने से उन्होंने अपना नामधर्म निबाहते हुये मेन का यानी मुख्य कार्य तो कर ही दिया कि हमारे एक साथी के साथ हुए अन्याय पर तुरत कार्रवाईस्वरूप रंजीत को जेल भिजवाने जैसा दुरुह कार्य फलीभूत करवा दिया। जबकि हालात ये हैं कि आजकल इंसान की आंख फोड़ने या हड्डी तोड़ने की तो कौन कहे, तड़पा तड़पा कर जान से मारने के बावजूद भी घंटे भर की कैद किसी रसूखदार इंसान को होना दूर की कौड़ी है। फिर आवाराओं को हाथ लगाने की भला कोई जुर्रत कर सकता है, कदापि नहीं। इस तथ्य के सामने आने पर श्वानधर्म का पालन करते हुए सभा में उपस्थित समस्त श्वानों ने भांति भांति से पूंछ लहरा कर मेनका जी के इस शुभ कार्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। कुछ बेसब्रे श्वान तो अपनी कल्पनाओं में मेनका जी से गलबहियां करने का आनंद ले बैठे। उन्हें वे श्वनावतार ही नजर आ रही थीं। जितना उन्होंने किया उतना तो आज तक उनके किसी सगेवाले ने भी नहीं किया था। इतिहास इसकी संपूर्ण कहानी बयान कर रहा था। एक नया इतिहास रचा गया था। इंसानों के अखबार इस सचित्र खबर से अटे पड़े थे। जिससे सारी श्वानजाति हर्ष के उन्माद से ग्रस्त थी।
इससे यह सच भी सामने आया कि यदि झुग्गी झोपडि़यों अथवा अवैध कालोनियों और बांग्लादेशियों के वोटों की तरह श्वानवोट नेताओं के काम आ पाते, यदि श्वानों को वोट का अधिकार मिला होता तो इस सृष्टि की तो खैर क्या ... किसी भी ग्रह से मेनका की सफलता को कोई बाधित ही नहीं कर सकता था।
पालतू श्वानों को श्वान समाचार नामक अंतर्जाल पत्रिका से जब इस बाबत जानकारी मिली तो हर्ष से उन्होंने भौंकना शुरू कर दिया और आवारागी में अपनी अटूट आस्था प्रदर्शित की। इस श्वानज्ञान के पश्चात् उनका बंगलों, कोठियों में रहने रोजाना मांसाहार, पनीर पाने, नर्म गद्दों, कोमल गोदों, हसीनाओं की महक सूंघने और गाडि़यों में घूमने जैसी श्वानविलासिताओं से मोह भंग हो गया और उन्होंने आवारगी में न शामिल होने की बेचारगी पर भी भौंक कूंक कर दुख प्रकट किया। श्वानों के साथ यही सबसे बड़ी समस्या रही है कि जिस तरह तलब लगने पर उनकी एक टांग स्वयं उठ जाया करती है उसी प्रकार कोई भी भाव प्रदर्शित करना हो तो वे भौंक कूंक कर ही प्रदर्शित करने के लिए विवश हैं क्योंकि पूंछ हिलाने में अब उनका विश्वास कायम नहीं रहा है। कारण उसमें से ध्वनि का जन्म नहीं होता है। बिना ध्वनि के इस भौंपूयुग में अपनी बात कहना कारगर नहीं रहा है।
इस बात पर भी खूब चिंतन हुआ कि अगर हम किसी को संदिग्ध समझ कर दांत गड़ा भी देते हैं तो इससे हमारी वफादारी ही साबित होती है न कि बदमाशियत। फिर भी बदमाश इंसान हमें कालू, कालिया, पप्पी जैसे नाम से ही संबोधित करता है मुन्ना, पप्पू, राजू जैसे सार्थक नाम देने से परहेज। एक देश में महाबदमाशों ने अपने नाम निहायत उम्दा यानी शरीफ रख छोड़े हैं, हम उनसे तो बेहतर ही हैं, वफादारी निबाह रहे हैं। जबकि वे न तो अवाम के प्रति न कुर्सी के प्रति – सब तरफ से दागदार साबित हुए हैं।
यह चर्चा अभी और जारी रहती कि तभी अचानक श्वान समाचार की प्रति की एक झलक दिखलाई दी कि अनिल को बरी कर दिया गया है। इंसानों की इस ओछी हरकत से श्वानजगत में विद्रोह जाग उठा और अगले दिन इंसानों के समाचार पत्र में प्रकाशित खबर का शीर्षक था कि बरी अनिल को बिफरे क्रुद्ध श्वान झुंड ने बिल्कुल ही बरी कर दिया, बैरी मानकर। और एकाएक गली में एक आवारा कुत्ते के भौंकने की तेज आवाज से मेरी नींद टूटी जो कि जल्दी जागने के कारण दोबारा से मुझपर हावी हो गई थी, वो एक कूड़ा बीनने वाली को भौंक भौंक कर भगाने में जी जान से लगा हुआ था।

