गांधीगिरी के वर्तमान फंडे
>> Wednesday, December 19, 2007
नेट पत्रिका लेखनी के दिसम्बर अंक में प्रकाशित हास्य व्यंग्य का लिंक
http://www.lekhni.net/page11.html
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5 टिप्पणियाँ:
आपने उस लेख में लिखा:
"वर्तमान में गांधीजी को बाजार की मांग के मुताबिक पेश करके कैश किया रहा है। बापू ने जीवन भर चरखा चलाया और नेता उनकी नीतियों को चरखाते रहे। चरते रहे, खाते रहे। सबमें स्वार्थ छिपे हैं। "
एकदम सही बात है.
वहां टिप्पणी की सुविधा न दिखी तो यहां टिप्पा दिया -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??
हंसने का टानिक भी ग्रहण किया, गांधीगीरी के फण्डे भी सीखे। सुनों गुरू, यह सभी सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ किया।
गांधी के फंडे का उपयोग नेताओं द्वारा महज टी. आर.पी. बटोरने के लिए किया जा रहा है एक दिन ये फंडे भी फ्लाप हो जायेंगे.
समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : वेलेंटाइन, पिंक चडडी, खतरनाक एनीमिया, गीत, गजल, व्यंग्य ,लंगोटान्दोलन आदि का भरपूर समावेश
क्या बात हैं ......
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