अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

...... और मूर्तियों की माया (अविनाश वाचस्‍पति)

>> Thursday, July 9, 2009

(बड़ा करके पढ़ने के लिए इमेज पर चटका लगायें)
माया का दिल देखिए मूर्तियां हाथी की बनवाईं हैं तो दिल भी उनका हाथी बराबर ही हुआ तभी तो 10 प्रतिशत बजट छोड़ दिया है। आखिर है किसी का इतना उदार दिल। अगर वे 100 प्रतिशत बजट से मूर्तियां बनवातीं तो भी आप जनहित याचिका ही दायर करते और उस पर सुप्रीम कोर्ट कारण बताओ नोटिस जारी करती। आप माया की दयालुता पर ऋणीय होना तो दूर आंखें और तरेर रहे हैं। बदमाश तो आप ही हुये न। आंखें तरेनना सदा से ही गलत अर्थ देता रहा है।

इस सवाल पर बवाल मचाकर आप सबने अपनी संगदिली का ही परिचय दिया है। आप थोड़ा और गहराई से विचार करेंगे तो पायेंगे कि मूर्तियां बनवाना चंदा उगाहने से कम घृणित कार्य है और आप दोनों कारनामों को समान घृणा से देख रहे हैं। जबकि अब बजट में राजनीतिक पार्टियों को दिए वाले चंदे में 100 प्रतिशत छूट दे दी गई है और यह अच्छी बात नहीं है। कारनामों को करतूत का दर्जा आप जैसे लोग ही देते हैं और सदा देते ही रहेंगे। जब वे चंदा वसूल रही थीं तब आपने इसे भी शर्मनाक कहा और अब जब मूर्तियां बनवाईं तो इसे भी शर्मनाक कह रहे हैं। वे कार्य बदल लेती हैं पर आप हैं कि शर्मनाक शर्मनाक ही बिसूरते रहते हैं। कभी शर्मकान या शर्मआंख नहीं कहते। आखिर आरोपों में कुछ तो विविधतापूर्ण कलात्मिकता आनी ही चाहिए। अगली बार मूर्तियां बनवाना भी किसी विधेयक के जरिए वैधानिक हो जाएगा।

एक तथ्य और काबिलेगौर है कि मूर्तियां बनवाना और उन्हें लगवाना आपराधिक कृत्य तो नहीं है। इस बार तो मूर्तियां बनवाई हैं अपनी और हाथियों की। हाथियों की मूर्तियां बनवाना इसलिए जरूरी है कि इससे विशालता का बोध होता है।

वैसे चिंतन किया जाए तो पायेंगे कि मूर्तियां न तो रिश्वयत लेती हैं और आप न चाहें तो रखरखाव भी नहीं मांगती हैं। चाहे पक्षी इस पर बैठकर अपनी दीर्घशंका का निवारण करते रहें। धुलाई नहलाई भी मानूसन में खुदबखुद ही हो जाती है। इसके लिए आपको अलग से बटालियन तैनात नहीं करनी पड़ती और इनकी सुरक्षा का तो कोई चक्कर ही नहीं है। वे मूर्तियां ही किसी पर न गिर पड़ें सुरक्षा तो इससे चाहिए और जिसे चाहिए वो खुद ही दांये बांये हो लेगा और आवश्यक समझेगा तो हेलमेट पहनेगा। मूर्तियों के लगने से शहर के सौंदर्यीकरण में अभिवृद्धि होती है। मूर्तियां ही तो लगवाई हैं कोई ऐसा कारखाना तो नहीं लगवाया है जो बिजली की चोरी कर रहा हो या प्रदूषण फैला रहा हो। मूर्तियां हैं सो चुपचाप खड़ी रहती हैं। इतनी चुपचाप की धूप, पानी, आंधी की शिकायत भी नहीं करती हैं।


दैनिक हरिभूमि में पेज 4 पर प्रकाशित (10 जुलाई 2009)

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आदित्‍य, अल्‍हड़ और अब ओमजी भी चले गए - अ का जाना (अविनाश वाचस्‍पति)

>> Tuesday, July 7, 2009


पंकज सुबीर जी के ब्‍लॉग
कुछ खबरें और कुछ बातें
से मिली खबर
जिससे लग रहा था डर
पर डरने से कुछ नहीं मिलने वाला

अ अक्षर से था इनका नाम
जो चले गए हंसाते हंसाते
अ से आदित्‍य
अ से अल्‍हड़
और
अब अ से ओम
(अपवाद न से नीरज और ल से लाडसिंह गुर्जर)।

अ अक्षर से आना होता है
पर यहां तो अ वाले
जा रहे हैं
पर ऐसा नहीं
अ वाले सभी डर रहे हों।

डरना चाहिए भी नहीं
हाथ में नहीं किसी के कुछ
भाग्‍य ही है सदा सब कुछ
होनी है बलवान और
अनहोनी उससे अधिक पहलवान।

ओम जी को विनम्र श्रद्धांजलि
उनकी कविताएं हंसाती रहेंगी सदा
माहौल बनाती रहेंगी खुशनुमा
जाना इन सबका सबको खला।

भर आया लिखते हुए भी मेरा गला
आंख में आंसू हैं दिल में उदासी है
हास्‍य कविताओं के मैदान में हुई
यह कैसी महा दुर्घटना सी है
इसने हर आंख नम कर दी है
ओठों पर फड़कन जरा सी है।

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ओबामा ने मारी मक्‍खी : दैनिक हरिभूमि में आज प्रकाशित व्‍यंग्‍य

>> Tuesday, June 30, 2009


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आप नहीं पहचानेंगे तो हम तो बता ही देंगे

>> Friday, June 19, 2009


आप नहीं पहचानेंगे
तो हम तो बता ही देंगे
पर चित्रों का पूरा मजा
आपको कल ही देंगे।

आज शहर में
और भी हैं
पहले उनसे
मिल तो लें।

शहरों में शहर
यह नई दिल्‍ली है
पर चित्र में नहीं
उड़ रही खिल्‍ली है।

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मौत कवि सम्‍मेलन सुन रही थी (अविनाश वाचस्‍पति)

>> Monday, June 8, 2009

कान में दीवार
दीवार में कान
किस्‍से खूब बुने
सुने भी बहुतेरे।

देखें जानें पहचानें
होते हैं कान
मौत के भी
जिससे सुनती है
रहम की अपील
कभी हां कभी ना।

कहें चौरासी है बुलाती
मुक्ति दिलाने के लिए
84 लाख योनियों से
पीछा छुड़ाने के लिए
आप जानते ही हैं
आवश्‍यक है
मौत का जल्‍दी आना
दरवाजा भी न खटखटाना
तेजी नहीं सुहाती
मौत की किसी को भी जबकि
मौत ही है सबसे बड़ी थाती।

जान गए हैं सब
कवि सम्‍मेलन भी सुनती है
मौत अब
वहां पर खिलखिलाती है
ठहाके लगाती है
खुद पर किए कटाक्ष
उसे भी करते हैं उत्‍तेजित
उस रात यही हुआ।

ठहाके लगाए थे मौत पर
सब खिलखिलाए थे मौत पर
मजे खूब आए थे मौत पर
मौत ने जो जो सुना
सब कुछ याद रखा।

जब ओम व्‍यास ने कहा
आदित्‍य 84 के हो चुके हैं
तो मौत ने समझा होगा
84 लाख योनियां पूरी
उसने कम कर दी दूरी।

अगली बार शायद ही
इनका आना हो
तो मौत ने उन्‍हें
अविलंब बुला लिया।

नीरजपुरी के भार पर
जब किया वार
श्रोता वैसे तो इन्‍हें
पलकों पर उठाना चाहते हैं
पर इन्‍हें भगवान ही
उठा सकता है और
मौत भगवान बन गई
नीरजपुरी के भार से
उसकी देख लो ठन गई
उसने उठा लिया तत्‍काल।

मौत ने यह भी रखा ध्‍यान
नीरजपुरी ने जो किया आह्वान
अकेले नहीं जायेंगे
जो उन्‍हें उठायेंगे
उन्‍हें भी साथ ले जायेंगे
पर मौत ने उठाने तक
का भी नहीं किया इंतजार
मौत क्रूर हो गई।

साथ वालों को तो साथ ले लिया
उठाने वालों को छोड़ दिया
पता चला है इससे
मौत रहम भी करती है।

सबकी तेरहवीं एक साथ होगी
तेरहवीं की अद्भुत मिसाल होगी
लाड सिंह गुर्जर तो
गिनती पूरी करने के चक्‍कर में
ले जाए गए
जो घायल हुए हैं
शायद मौत को
उन पर रहम आ गया होगा
मौत की आंखों में
अपनी इस करनी पर
भरपूर पानी आ गया होगा
सोच रहा हूं
वाहन का क्‍या कसूर था ?

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पी एम ने फोन किया है : यहां पर पढि़ए (अविनाश वाचस्‍पति)

>> Sunday, June 7, 2009

आज सुबह मुझे पी एम का फोन आया तो मैंने जो अंदाज लगाया उसे आप भी महसूसिये। इस फोन के आने की वजह हो सकती है पिछले दिनों सरकारी नवरत्नफ दूरसंचार कंपनी की हड़ताल के कारण पब्लिक की खड़ताल बजी थी, इंटरनेट से सर्व करने और फोन से बात करने को पब्लिक तरस गई, रह रहकर यही सुनाई पड़ता रहा कि नेटवर्क बिजी है। बिना काम किए बिजी। व्यस्तसता का यह अनोखा उदाहरण है। अब पी एम ने इस मामले में डायरेक्टस इंटरेक्ट किया है। इस बहाने वे यह भी जांच रहे हैं कि कौन कौन सी कंपनियों के सिग्न‍ल सरकारी कंपनियों के कारण गायब हो रहे हैं और किस खास कंपनी के स्ट्रांग। इस स्ट्रांग होने में कौन कौन रांग (गलत) है, वैसे हड़ताल की यह नहीं है मांग। फिर भी बदस्तूर बजता रहा नेटवर्क बिजी है का सांग।

सरकारी दूरसंचार कंपनी के कर्मियों की हड़ताल का सीधा लाभ या मजबूत सिग्नंल किस कंपनी का बना, इससे परोक्ष तौर पर यह भी जाहिर हो गया है कि किसके इशारों पर किसके सिग्नल्स को कमजोर किया जा रहा है। जिसके सिग्‍नल्स मजबूत बने हुए हैं, लाभ तो वे ही उठा रहे हैं और डिमांड भी उनकी बढ़ गई है। प्रतिस्पर्धा का जमाना है और स्वस्‍थ प्रतिस्पर्धा जब पी एम की कुर्सी पाने में भी नहीं रही है तो अन्य किसी क्षेत्र में मिल सकेगी, ऐसा विचारना भी बेमानी होगा।

पी एम के पद को पाने की होड़ में दौड़ दौड़ कर न जाने कितने ऐरे गैरे नत्थू खैरे वेटिंग में खड़े क्‍या हो गए, अपने को पी एम समझने लग गए और उनकी तरह आचरण करना भी शुरू कर दिया। पर जो काबिल रहा पी एम वही बना, अब काबलियत के तरीके पर चाहे कितने ही प्रश्न खड़े कर लिए जाएं, उनकी कोई अहमियत नहीं है। जितने वेटिंग में थे सबकी जमकर हूटिंग हो रही है जैसे बारिश के मौसम में बादलों की गर्जना होती है। कही गर्ज ना जाती है पर गर्जन डराती है, भय पैदा करती है।

देश में समस्या ओं का मेला लगा हुआ है। इस मेले के झमेले में पब्लिक ही भोग रही है। सीधे पी एम का पब्लिक की समस्याओं के इस फटे में टांग अड़ाना विरोधियों को इसलिए नहीं सुहा रहा है कि जो चुने गये हैं, उन्हें पब्लिक ने चुना है। पी एम ने उनसे बात की तो पब्लिक ने सुनी है। पब्लिक बहुत ही गुणी है। इंतजार में है कि पी एम का फोन सीधे उन्हें भी आ सकता है। सब अपनी अपनी समस्याएं याद करके बैठ गए हैं। समस्याओं का अंबार है – कहीं पानी गायब, कहीं से बिजली गुल, दिक्कतों की बज रही है कंटीली धुन। ऐसे में पी एम की आवाज अवश्यक ही राहत बरसाएगी। पब्लिक कुछ तो मीठे फल पाएगी।

उम्मीद है यह सिलसिला चल निकलेगा और गाहे बगाहे पी एम का फोन किसी न किसी मुद्दे पर मेरे पास आयेगा और मैं आपको उसका पूरा किस्सा सुनाऊंगा।

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पी एम ने फोन किया है : हरिभूमि दैनिक में पढ़ें (अविनाश वाचस्‍पति)

>> Friday, June 5, 2009

पी एम ने फोन किया है
शीर्षक व्‍यंग्‍य आज
शनिवार 6 जून 2009 के
दैनिक हरिभूमि में
पेज 4 पर पढ़ें
जो कि ऑनलाईन भी
उपलब्‍ध है।

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