सुहानी स्मृतियां : 6 दिसम्बर मुबई ब्लॉगर मिलन : जीवन भर रहेगा याद (अविनाश वाचस्पति)
>> शुक्रवार, १८ दिसम्बर २००९
एक टिप्पणी मिली थी किमुंबई ब्लॉगर मिलन के आयोजनपूर्व किसी पोस्ट पर की गई यह टिप्पणी बिल्कुल सटीक है।
6 दिसम्बर को अब एक अच्छे
कार्य के लिए भी याद रखा जाएगा।
सुबह ही कथाकार सूरज प्रकाश जी का फोन आ गया कि मुंबई ब्लॉगर मिलन में चलने का क्या कार्यक्रम है, मैंने बतलाया कि मैं कुर्ला (पूर्व) में ठहरा हूं। मुझे नहीं मालूम कि नेशनल पार्क, बोरीवली कहां पर है, किस दिशा में है और वहां पहुंचने में कितना समय लगेगा ? सूरज जी ने जानकारी दी कि मैं मलाड में रहता हूं और यहां से बहुत अधिक दूर नहीं है। मुझे सूरज प्रकाश जी से भी मिलना था तो मैंने पूछा कि मैं आपके पास आ जाता हूं, वहां से इकट्ठे ही चलेंगे, वे सहमत हो गए। उन्होंने यह भी बतलाया कि कुर्ला (पश्चिम) से सीधी बस उनके यहां तक आती है इसलिए बस से ही आना सुविधाजनक रहेगा और मैं ही क्या सब ही सुविधा की खोज में सदा रहते हैं।

कुर्ला (पश्चिम) मैं लगभग 12 बजे पहुंच गया और जानकारी हासिल की कि बस नंबर 349 मलाड होती हुई जाती है। बस तैयार खड़ी थी, सीटें भी खाली थीं। मैं दाहिनी ओर सावधानीपूर्वक यह देखकर कि कहीं मुझे बीच में ही किसी महिला या विकलांग सज्जन द्वारा उठा न दिया जाये जबकि मैं भीड़ देखकर स्वयं ही उठ जाता हूं। मुझे अच्छा नहीं लगता कि इनके बस में खड़े रहने पर मैं बैठा रहूं। मैं ड्राइवर साइड में आगे से दूसरी सीट में बैठ गया। खिड़की की तरफ बैठे युवक से मैंने पूछा कि यह बागेश्वरी मंदिर जायेगी, उसके द्वारा पुष्टि किए जाने पर मैं निश्चित होकर बैठ गया और कुर्ला में खरीदे हुए नवभारत टाइम्स इत्यादि हिंदी अखबार निकाल कर पढ़ने की कोशिश करने लगा परंतु मन नहीं लगा। अगर पढ़ने में तल्लीन हो जाता तो दृश्यों को कैसे देख पाता। खैर ... नवभारत टाइम्स साथ वाले युवक ने ले लिया और वो उसे पढ़ने में खो गया।

यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि अभी भी हिन्दी में पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं है, हम बेकार में ही चिंता करते हैं। लोगों तक चीजें पहुंचें तो या उनकी पहुंच में तो हों। कई विवशताएं ऐसा होने नहीं देती हैं। मैंने बीच में जब दो बार उस युवक से पूछा कि बागेश्वरी मंदिर आने वाला है क्या, तो उसने कहा कि अभी दूर है। तभी मुझे याद आया कि सूरज जी ने ओबराय मॉल का जिक्र किया था कि जब वो दिखाई दे तो मुझे फोन कर देना और वहां से चौथे बस स्टाप पर उतर जाना। वहीं पर मैं अपनी कार के साथ इंतजार करता मिलूंगा। मैंने उस युवक से पूछा तो उसने बतलाया कि उसे भी बागेश्वरी मंदिर के स्टॉप पर ही उतरना है। यह जानकर मुझे बहुत राहत मिली और मैं बस में बैठे बैठे मुंबई की सड़कों की भीड़ में खो गया।

एक जगह आकर बस अंदर की ओर मुड़ी तो उस युवक ने कहा कि अगर यह बस सीधी जाती तो 5 मिनिट में हम बागेश्वरी मंदिर के स्टॉप पर पहुंच जाते। पर यह घूमकर जायेगी इसलिए 15 से 20 मिनिट लगेंगे। और एक उपयोगी जानकारी भी दी कि अगर आपने 20 रुपये का पूरे दिन का बस पास बनवा लिया होता तो आप किसी भी बस में कहीं से कहीं तक रात को 12 बजे तक आ-जा सकते थे। वर्किंग डे में यह पास 25 रुपये में बनता है। मेरा टिकट 14 रुपये का था। मेरे न सही और भी जो भी मुंबई में जायें अथवा रहते हों इस सूचना का लाभ ले सकते हैं। खैर ... कुछ देर बाद जब बस फ्लाईओवर के नीचे से दाहिनी ओर मुड़ी तो सीधे हाथ पर ओबराय मॉल दिखाई दिया और मैंने तुरंत सूरज जी को फोन कर दिया। चौथे बस स्टॉप पर पहुंचने से पहले रिद्धि या सिद्धि गार्डन कॉम्पलैक्स दिखलाई दिया तो मैं बस से उतरकर उस कॉम्पलैक्स की ओर चलने लगा परंतु पीछे से सूरज जी की आवाज सुनाई दी। मुझे यहां बुलाकर उधर किधर चल दिये, मैंने देखा तो सूरज जी अपनी कार में सवार मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। सूरज जी से मैं पहले दिल्ली में मिल चुका हूं।

मैंने कहा कि पीछे कॉम्पलैक्स पर वही गार्डन लिखा है जहां पर आप रहते हैं। तो मैं तो आपके पास ही जा रहा था। खैर ... कार में बैठने पर सूरज जी ने जानना चाहा कि क्या फिल्मसिटी चलना चाहोगे, मैंने कहा लगभग 15 बरस पहले घूमा हुआ है परन्तु चलिए अब भी घूम आते हैं। वे अपनी कार लेकर उस तरफ मुड़ गए। परन्तु फिल्मसिटी के मुख्यद्वार पर बिना पास और जांच के किसी को जाने नहीं दिया जाता है। मैंने वहां पर अपना कार्ड दिखलाया और उन्हें बतलाया कि राजश्री के लेक के पास वाले सैट पर जा रहे हैं। जहां पर निर्देशक अरविन्द बब्बल के धारावाहिक 'जो मैं घर घर खेली' की शूटिंग हो रही है, उन्होंने बुलाया है। मुख्य गेट वाले मेरा परिचय पत्र और यह विवरण सुनकर आश्वस्त, हो गए और उन्होंने हमें जाने दिया।

हम सैट पर पहुंचे। रविवार होने के कारण
वहां पर शूटिंग नहीं हो रही थी और अन्य सैटों पर भीवहां पर उस दिन रविवार होने के कारण अधिक भीड़ भड़क्का नहीं था। एक दो जगह उतरकर हमने सैट देखे।
कुछ चित्र कार में बैठे बैठे और एक दो उतर कर भी खींचे।
यहां से हम सीधे सूरज प्रकाश जी के घर पहुंचे। वहां पर मधु जी यानी भाभीजी फोन पर व्यस्त थीं। सूरज जी के बेटे से भी परिचय हुआ। नाम मुझे याद नहीं रहा है। अक्सर नाम और स्थान भूलने की मेरी यह नई आदत है जो कुछ ही बरस पुरानी है। भोजन का समय हो चुका था। भूख भी लग चुकी थी। हमने वहां भोजन किया पर सब कुछ भूल जाऊं पर उस दही को नहीं भूल सकता जो अपनी जमावट से पनीर होने का आभास दे रहा था। भोजन में दाल, चपाती, चावल, सलाद ने खूब आनंद दिलाया इस आनंद को जमाने का कार्य दही ने ही पूरी शिद्दत से किया।

भोजन के बाद समय देखकर भाभीजी ने पूछा चाय पिओगे तो मैंने यह कहते हुए हामी भर दी कि चीनीबिन वाली चाय ही चलेगी। चीनीकम नहीं चलेगी। खैर ... चाय पीकर हम नेशनल पार्क, बोरीवली की ओर सूरज जी की कार में निकल लिए। रास्ते में ही विवेक रस्तोगी को फोन कर दिया कि सूरज जी और मैं 15 से 20 मिनिट में मुंबई ब्लॉगर मिलन स्थल यानी त्रिमूर्ति जैन मंदिर पहुंचने वाले हैं। कुछ ब्लॉगर साथी वहां पहुंच चुके थे, कुछ रास्ते में थे। समय अभी 3 से कुछ ही अधिक हुआ था।

आशीष अंशु (बतकही) ने डॉ. रूपेश श्रीवास्तव (भड़ासफेम) का नंबर दिया था। उनसे गोवा से ही बात हो गई थी। मुंबई आने पर भी बात हुई थी और मुझे पूरा विश्वास था कि वे अवश्य अपने साथियों के साथ मिलन स्थल पर पहुचेंगे।

विवेक रस्तोगी (कल्पतरू) ने महावीर सेमलानी (हे प्रभु यह तेरा पंथ) से भी फोन पर बात करा दी थी, इस आयोजन की सफलता विवेक रस्तोगी और महावीर सेमलानी के नाम लिखी गई।

अगली चर्चा के लिए एक ब्रेक और ... कोई बोर होकर ढेर न हो जाये, पर्याप्त सावधानी बरतते हुए।

इन रेखाचित्रों को पहचानने के चक्कर में कहीं टिप्पणी देना न भूल जायें। अथवा टिप्पणी तो दें परंतु सिर्फ नाम ही बतलाकर न लौट जायें।













